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चंद्रघंटा देवी की कथा।।

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नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि माता रानी का चंद्रघंटा स्वरूप भक्तों को निर्भय और सौम्य बनाता है। ज्योतिषियों के अनुसार माना जाता है कि जिन जातकों का चंद्रमा कमजोर होता है। उन्हें मां चंद्रघंटा की पूजा अवश्य करनी चाहिए।  माता का तीसरा रूप मां चंद्रघंटा शेर पर सवार हैं। दसों हाथों में कमल और कमडंल के अलावा अस्त-शस्त्र हैं। माथे पर बना आधा चांद इनकी पहचान है। इस अर्ध चांद की वजह के इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा की पूजा में उपासक को सुनहरे या पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए । मां को सफेद कमल और पीले गुलाब की माला अर्पण करें। मां को केसर की खीर और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए।  पंचामृत, चीनी व मिश्री भी मां को अर्पित करनी चाहिए। मंत्र पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।। जय माता दी 🙏🇮🇳 #जयमातादी #jaimatadi #नवरात्रि

देवी शैलपुत्री की कथा।।

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देवी शैलपुत्री की कथा।। दुर्गा जी पहले सब रूप में मां शैलपुत्री के नाम से जानी जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्रों में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा अर्चना होती है। इन्हीं देवी को सती के रूप में भी जाना जाता है। एक समय जब सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ रचाया तब सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया किंतु अपने जमाता भगवान शिव और देवी सती को आमंत्रित नहीं किया। जब इसका ज्ञान माता सती को हुआ तो उन्होंने यज्ञ में जाना चाहा भगवान शंकर ने उन्हें बहुत समझाया बहुत रोका कि हमें किसी भी स्थान पर तब तक नहीं जाना चाहिए जब तक वहां से आमंत्रण ना आया हो। किन्तु देवी सती नहीं मानी और भाई यज्ञ में चलेंगे यज्ञ पहुंचकर जब उन्होंने भगवान शिव का स्थान ना देखा तब अपने पिता से प्रश्न किया। किन्तु उनके पिता ने भगवान शिव अर्थात देवी सती के पति के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया और बुरा भला सुनाया। अपने पति का अपमान देवी सती सहन ना कर पाए और यज्ञ के हवन कुंड में कूद अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह दुख भगवान शिव सहन ना कर पाए और दक्ष ...