ईश्वर के साक्षात्कार से जुड़ी एक जीवन घटना🙏🇮🇳
अगर कोई व्यक्ति कहता है कि उसे जीवन में कभी ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हुआ तो यह संभव है हर व्यक्ति को कभी ना कभी जीवन में ईश्वर का साक्षात्कार जरूर होता है किंतु जब तक उसे समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी ऐसी ही एक घटना मेरे साथ भी हुई।
तकरीबन 10–12 साल पहले की बात है। राखी के दिन थे, मैंने मेेरे एक दोस्त से कहा कि इस साल राखी पर हम वैष्णो देवी के दरबार चलते है। मैं माता वैष्णो देवी को अपनी बहन मानता हूं तो दिल ने कहा कि इस राखी माता वैष्णो देवी से ही बनवाए गे। पूरी प्लैनिंग हो ग्यी जिस दिन जाना था पहले ऐसा लगा जैसे पांव मेें सुइयां सी चुब रही है पर मन में विश्वास था लेकिन थोड़ी देर बाद ऑफिस से निकला तो सीढ़ियों मेें से गिर गया।
पांव मेें सोजिश हो गई एैसे लगा जैसे कोई जाने से रोक रहा हो। पास ही एक पहलवान को दिखाया उसने बोला एक दो दिन में चलने लायक हो जाओ गए।
घर पंहुचा तो Cousin Sister आ रखी थी वोह बोली देखा माता रानी भी कहती की घर पर रहो, पर दिल ना माना।
रात की ट्रेन की टिकट थी मैं और मेरे दोस्त चल पड़े मां के दरबार मन में आस लिए कि मां के दरबार पर को धागे लेकर जा रहे है उन्हीं को माँ का आशीर्वाद मान हाथों पर बांधे गए।
सुबह कटरा पहुंचे तो एक छोटी सी बच्ची आई बोली राखी बंधवा लो बय्या पर मैंने कहा अभी तो नहाया भी नहीं अभी कैसे बंधवा लू। वोह बच्ची काफी बोलती रही पर मैंने मना कर दिया। इतने मेें वो चली गई पर मन में आया कि उसका दिल नहीं तोड़ना चाहिए। जैसे ही मैंने मुड़कर उसे आवाज देनी चाही तो वहा कोई बच्ची नहीं थी। मैंने अपने दोस्त से पूछा तो वो बोला कि कौनसी बच्ची मैंने तो किसी को नहीं देखा।
वोह कोई और नहीं माता रानी ही थी नहीं तो उसी समय गायब कहा हो जाती और मेरे दोस्त ने उसे क्यों नही देखा।
मन में ठान लिया कि इस बार आरती मेें भी बैठे गए और माँं का आशीर्वाद भी पायेंगे।
वाण गंगा में इश्नान करने के बाद जैसे तैसे चरण पादुका पहुंचे।
वहा मैंने मां का दर्शन किए और अपनी पट्टी खोल दी और मां से कहा कि अभ तेरे सहारे हूं जैसे मर्जी दर्शन करा माये।
फिर क्या चमत्कार सा हुआ बड़ी आसानी से सफर हुआ बिना दर्द के भवन पहुंच गए।
वहा दर्शन के लिए कोई लाइन नहीं। पहला नंबर अपना था। माता रानी के सबसे खुले दर्शन जीवन मेें पहली बार हुए। पण्डित जी को सारी बात बताई उन्होंने हमारे धागे मां के पिंडी रूप से स्पर्श कर हमे बांधने के दिए।
उस दिन 7 बार दर्शन किए। आखरी बार जब दर्शन कर निकले तो एक फौजी भाई बोला कि आप शायद आरती के लिए बार आ रहे है पर आरती से पहले जितने भी अन्दर यात्री होंगे उन्हें दर्शन करा साफ सफाई के बाद जो लाइन मेें होते है वहीं आरती मेें बैठते है। और अभी लाइन लगनी शुरू हो गया है इसलिए बागो अगर आरती मेें बैठना है।
बस फिर क्या हमने वह से भागना शुरू किया मेरी दर्द और सोजिष भूल मैं 3 नंबर गेट पर पहुंचा व्हा लम्बी लाईन। जो पुलिस सेवादार आगे हमे जाने दे रहे थे उन्होंने रोक लिया।
मैंने मन ही मन मां को पुकारा कोई तोह रास्ता दिखा। बस उसी समय लाइन मेें 2 लोग आपस में लड़ने लगे। मैं और मेरा दोस्त फटाफट अन्दर कि और बागे। जैसे ही हमने भवन के द्वार मेें परवेश किया यहां आरती की लाइन थी।
तुरंत बाद द्वार बंद कर दिया मानो की माता रानी ने ही हमे वहा तक पहुंचाया।
आरती का आनन्द ले हम मां के दर्शन कर भैरो बाबा का दर्शन के लिए निकले। ओर भी कई दिलचप्स किससे हुए जिसका जिक्र मैं फिर कभी करूंगा।
यह मेरे जीवन कि दूसरी पर सबसे खास यात्रा थी जो सारी उम्र मेेरे लिए एक शाप शोड़ गई।
हम अक्सर ऐसी गलती करते है जो सारी उम्र याद रहती है। अगर उस दिन राखी बंधवा लेता तोह दिल को सकून होना था।
आपको मेरा यह जीवन सफर कैसा लगा और अगर आपके साथ कुछ ऐसा हुआ हो तोह जरूर बताएं।
जय माता दी
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