सूर्य पुत्र करण के जीवन का पूरा सच, कवच से जुड़ा पूरा रहस्य?
करण को सूर्य देव का अंश और एक राजा की सन्तान होते हुए भी इतना कष्ट क्यों सहना पड़ा।
पुराणिक कथाओं के आधार पर इन सब की कड़ी करण के पिछले जन्म से जुड़ी है।
करण दम्बोद्भव नामक राक्षस का पूर्ण जन्म था। दम्बोद्भव ने सूर्य देव की घोर तपस्या कर उन्हे प्रसन किया। सूर्य देव ने उसे वरदान मांगने को कहा और हर राक्षस की तरह उसने भी अमर होने का वरदान मांगा। लेकिन सुर्य देव बोले जिसने जन्म लिया है उसकी मर्त्यु भी होगी यह एक सच है अतः तुम कुछ और मांगलो।
दम्बोद्भव बोला की आप मुझे 1000 दिव्य कवच का वरदान दे और एक कवच को व्ही तोड़ सके जिसने 1000 वर्ष तपस्या की हो और जो कोई एक कवच तोड़े तो उसकी तुरन्त मर्त्यू हो जाए। सूर्य देव जानते थे कि व्ह इस वरदान का दुरुपयोग करे गा किंतु भक्ति का फ़ल देना एक विधि का विधान है।
इसलिए सूर्य देव ने उसकी ईषा अनुसार वरदान दे अंतर्ध्यान हो गए।
दम्बोद्भव कवच की सुरक्षा पाकर खुद को अमर मानने लगा और कोई उसे मार नहीं सकता इस घमंड में उसने लोगो पर अत्याचार करने शुरू कर दिए।
1000 कवच की शक्ती पाकर वह सहस्र कवच के नाम से जाना जाने लगा।
इसी बीच दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री मूर्ति का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र धर्म से किया। मूर्ति ने सहस्र कवच के अत्याचारों का सुन रखा था और उन्होंने भगवान् श्री हरी से प्राथना की व्ह उसका संहार करें। श्री हरि ने उन्हें आश्वासन दिया।
समय बीतने पर देवी मूर्ति ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया जिनका नाम नर और नारायण रखा गया। व्ह दोनों भगवान विष्णु के अवतार और दो शरीर में एक जान थे। एक बार दम्बोद्भव इस वन पर चढ़ाई करने आया, तब उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव हुआ।
तभी वे तेजस्वी पुरुष दम्बोद्भव से बोला कि मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूं। दम्बोद्भव हंसकर बोला की तुम मेरे बारे में नहीं जानते। मुझे बस व्ही शक्स हरा सकता है जिसने 1000 वर्ष तपस्या की हो। नर बोला मेरा भाई और मै 2 शरीर एक जान है वोह मेरी जगह तप कर रहा है और मैं उसकी जगह युद्ध कर रहा हु।
जैसे जैसे नारायण का तप 1000 वर्ष पूर्ण के समीप आया नर की शक्ति बड़ती गई और 1000 वर्ष पूर्ण होते ही एक कवच टूट गया। कवच टूटते ही वरदान के अनुसार नर की मृत्यु हो गई।
तभी दम्बोद्भव ने नर को अपनी तरफ आते हुए देखा लेकिन वोह नर नहीं नारायण थे और व्ह मृत नर के शव के पास आए और उनके कान मे मंत्र बोला और नर जीवित हो गए। उन्होंने 1000 वर्ष बागवान शिव की तपस्या की थी और मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि से नर को जीवित किया।
दम्बोद्भव के अभी 999 कवच बच्चे थे इस बार नारायण ने उसे युद्ध के लिए ललकारा और नर तपस्या करने चले गए। इसी परकार एक एक कर 999 कवच टूट गए। जब भी कवच टूटता तोह दूसरा भाई मंत्र से जीवित कर देता। 999 कवच टूटते पर दम्बोद्भव जान चुका उसकी मृत्यु समीप है।
इसलिए व्ह युद्ध भूमि से भाग गया और सूर्य देव के शरणागत हुआ। नर नारायण ने उसका पीछा किया और सूर्य लोक पहुंच सूर्य देव को दम्बोद्भव उन्हें सौंपने को कहा।
किन्तु अपने भक्त को सौंपने से सूर्यदेव ने इनकार कर दिया। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए। जैसे मैं और नर दो शरीर एक जान है उसी तरह तुम भी एक शरीर दो जान होंगे।
त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ हुआ।
देवी कुंती ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया और कर्ण का जन्म हुआ। कर्ण के रूप में सूर्य देव और दम्बोद्भव दोनों थे। जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है – सूर्य और सहस्रकवच । दूसरी तरफ नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए।
कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है, वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है। जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है।
नर नारायण ने सुर्य देव के वरदान का मन रखते हुए अवतार लिया और करण के रूप में दम्बोद्भव का वध नर अर्थात अर्जुन के हाथो हुआ।
अभ बात आती है कि वरदान के अनुसार कवच टूटते ही अर्जुन की मृत्यु क्यों नहीं हुई तो इस बात पर रोशनी डाल दें कि कवच टूटा ही नहीं। युद्ध 1000 वर्ष ना चले इसलिए श्री कृष्ण के कहने पर इंद्र देव एक संन्यासी बाण करण के पास गए और उनसे उनका कवच कुंडल दान में मांगा। सुर्य अंश के कारण करण दानवीर में सर्व श्रेष्ठ था और उसने जन्म से जुड़ा कवच कुंडल दान कर दिया।
कवच ना टूटने के कारण दम्बोद्भव अर्थात करण का वध सम्भव हुआ।
आपको यह कथा कैसी लगी ज़रूर बताएं।
जय श्री कृष्णा 🙏🇮🇳
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