भगवान शिव और उनके रूद्र अवतार के मध्य युद्ध की एक कथा।।
भक्त और भगवान का एक अटूट रिश्ता है। भक्त अपने भगवान के लिए और भगवान अपने भक्तों के लिए हर सीमा हर बंधन को तोड़ सकता है। इस संसार में प्रभु श्री राम भक्त हनुमान जैसा भक्त कोई नहीं जन्मा और ना ही देवा दी देव महादेव जैसे भगवान जो अपने भक्तों के लिए अपने इष्ट देव से भी लड़ने को तैयार हो गए।
श्री राम से जुड़ी क्यों रोचक कथाओं का वर्णन हमे अलग अलग वेद पुराणों में मिलता है। क्या आप जानते है श्री राम भक्त हनुमान और महादेव के मध्य युद्ध हुआ था? ऐसी ही एक कथा का वर्णन पद्म पुराण के पातालखंड में मिलता है।
यह बात उस समय की है जब प्रभु श्री राम ने पूरे विश्व में रामराज्य स्थापित करने के लिए अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा श्री राम भक्त हनुमान और शत्रुघ्न के नेतृत्व में छोड़ा।
घोड़े पर लिखी हुई चुनौती के अनुसार जो कोई घोड़ा रोकेगा उसे श्री राम भक्त हनुमान और उनकी सेना से युद्ध करना होगा अगर युद्ध में वे हार गए तो उन्हें अपनी हार स्वीकार कर श्री रामचंद्र की शरण में आना होगा।
घोड़ा जिस जिस देश से गुजरता सब उन्हें नमन कर श्री राम की शरण में आते। एक समय यज्ञ का घोड़ा घूमते हुए देवपुर नगर में पहुंचा। उस नगर के राजा का नाम वीरमणि था जो की भगवान शिव का परम भक्त था और उसे वरदान था जिस कारण देवपुर की रक्षा स्वयं भगवान शिव करते थे। वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने जब यज्ञ का घोड़ा देखा तो उसे बंदी बना लिया। यह बात जब घोड़े की रक्षा कर रहे शत्रुघ्न को पता चली तो उन्होंने देवपुर पर आक्रमण करने का निश्चय किया।
शत्रुघ्न और राजा वीरमणि की सेना के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ गया। हनुमान जी भी वीरमणि की सेना का संहार करने लगे। श्रीराम के छोटे भाई भरत के पुत्र पुष्कल ने जब राजा वीरमणि को घायल कर दिया तो उनकी सेना अपनी जान बचाकर भागने लगी।
जब महादेव ने अपने भक्त का यह हाल देखा तो वे भी उनके पक्ष में युद्ध करने लगे। भगवान शिव को युद्ध करते देख शत्रुघ्न भी वहां आ गए। दोनों के मध्य भयंकर युद्ध होने लगा।
भगवान शिव ने वीरभद्र को पुष्कल से और नंदी जी को हनुमाजनी से युद्ध करने के लिए भेजा। वीरभद्र और पुष्कल का युद्ध पांच दिन तक चलता रहा। अंत में वीरभद्र ने पुष्कल का वध कर दिया। ये देखकर शत्रुघ्न को बहुत दुख हुआ। शत्रुघ्न और क्रोधित होकर प्रभु शिव से युद्ध करने लगे। उनका युद्ध 11 दिनों तक चलता रहा। अंत में भगवान शिव के प्रहार से शत्रुघ्न बेहोश हो गए। यह देख हनुमान जी नंदी जी को प्रस्त कर स्वयं शिव से युद्ध करने को आए।
हनुमान जी भगवान शिव से पूछा की आप तो स्वयं श्री राम को अपना इष्ट देव मानते है तो फिर उनके कार्य में बादक बन हमसे युद्ध क्यों?
भगवान शिव बोले मैं भक्त की भक्ति के आगे वचन बध हूं। इसके बाद भगवान शिव और उनके रूद्र अवतार के मध्य भयंकर युद्ध हुआ। भगवान शिव हनुमान जी के युद्ध कोष्ल से परसन हो उन्हें वरदान मांगने को कहा।
तब हनुमानजी ने कहा कि इस युद्ध में भरत के पुत्र पुष्कल मारे गए हैं और शत्रुघ्न भी बेहोश हैं। मैं द्रोणगिरी पर्वत पर संजीवनी औषधि लेने जा रहा हूं, तब तक आप इनके शरीर की रक्षा कीजिए। शिवजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया।
हनुमान जी तुरन्त संजीवनी बूटी एलएलई आए और पुष्कल को जीवत कर शत्रुघ्न को सवस्त किया।
एक बार फिर से हनुमान और शत्रुघ्न के मध्य युद्ध शुरू हुआ। युद्ध मे किसी भी तरह से जीत के हालात ना देख हनुमान जी ने शत्रुघ्न से श्री राम का स्मरण करने को कहा।
श्री राम तुरन्त युद्ध भूमि में प्रकट हुए, अपने इष्ट देव को आए देख प्रभु महादेव ने उन्हें नमन किया और उनकी शरणगत हुए तथा वीरमणि और उनके योद्धाओं से भी हथ्यार डाल उनकी शरण में आने को कहा।
वीरमणि ने जब भगवान शिव से युद्ध की बात की तब भगवान शिव बोले की जिन श्री राम से मुझे युद्ध करना है वोह कहा है।
जब वीरमणि ने श्री राम की ओर देखा तो उनमें भगवान शिव नजर आए और शिव में श्री राम और श्री राम भक्त हनुमान में दोनो का सिमलित सवरूप।
वीरमणि को अपनी भूल का ज्ञात हुआ और उसने यज्ञ का घोड़ा भी श्रीराम को लौटा दिया और अपना राज्य भी उन्हीं को सौंप दिया और उनकी शरण मे चला गया। इस तरह वह युद्ध समाप्त हुआ।
जय श्री राम।।
जय भोले नाथ।।
जय हनुमान।।
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